थम जा , अब और नहीं

 थम जा , अब और नहीं







रास्ते अनजान हैं
गलियां भी सुनसान है
चारो तरफ धुंध ही धुंध है
कैसे पहचानू मैं
अपनी उस मंजिल को
अब तो बस यही कहना है अपने आप से
थम जा, अब और नहीं

बहुत पहले ही
मै तुम्हें खो चूका हु
खो चूका हु अपने आप को
इस अनजाने भीड़ में
अनजानी दुनिया में
कैसे ढूँढू अपने आप को
अब तो बस यही कहना है अपने आप से
थम जा , अब और नहीं

कहते है,
भागने का नाम जिंदगी है
जिसकी ना कोई मंजिल है
ना ही कोई वजूद
इस अनजानी भागदौड़ में
कब से दौड़ रहा हु मैं
अब तो बस यही कहना है अपने आप से
थम जा , अब और नहीं

Comments

Popular posts from this blog

THE MERITS AND DEMERITS OF STRUCTURALISM AND POST-STRUCTURALISM AS CRITICAL CONCEPTS ACCORDING TO TERRY EAGLETON

First Flight Class X All Chapters and Poems' Summary NCERT

Beehive All Chapters and Poems' Summary Class IX