आरक्षण - वरदान या अभिशाप
आरक्षण वरदान या अभिशाप 1: गरीबी और अपमान की नींव रामलखन की बात सुनकर मुकुल की आँखों में एक अजीब सी चमक और पीड़ा, दोनों एक साथ उभर आई। वह मात्र दस वर्ष का था, लेकिन समाज की कड़वी सच्चाई उसे समय से पहले बड़ा कर रही थी। मुकुल ने अपने पिता के खुरदुरे हाथों को पकड़ते हुए कहा, "पिता जी, आप कहते हैं न कि कर्मों का फल यहीं मिलता है? तो फिर हम क्यों भुगतें उन पापों को जो हमने किए ही नहीं? मैं पढूंगा, चाहे मुझे रात-रात भर जागना पड़े। मैं आपके और माँ के सारे सपने पूरे करूँगा।" मुकुल की माँ, यशोदा, की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने अपने बेटे को गले से लगा लिया। "मेरा लाल! तू बस अपनी पढ़ाई कर। दुनिया क्या कहती है, उस पर ध्यान मत दे।" दिन बीतते गए। मुकुल की दिनचर्या बेहद कठिन थी। सुबह उठकर पिता के साथ खेतों में जाना, मवेशियों को चारा डालना और फिर मीलों पैदल चलकर उस सरकारी स्कूल में जाना, जहाँ छत से बारिश का पानी टपकता था और टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती थी। इसके विपरीत, उसका मित्र रोहन (जिसके घर से मुकुल को भगा दिया गया था) गाँव के सबसे रसूखदार परिवार से था। रोहन के पास नई किताबें, ...