आरक्षण - वरदान या अभिशाप
आरक्षण
वरदान या अभिशाप
1: गरीबी और अपमान की नींव
रामलखन की बात सुनकर मुकुल की आँखों में एक अजीब सी चमक और पीड़ा, दोनों एक साथ उभर आई। वह मात्र दस वर्ष का था, लेकिन समाज की कड़वी सच्चाई उसे समय से पहले बड़ा कर रही थी।
मुकुल ने अपने पिता के खुरदुरे हाथों को पकड़ते हुए कहा, "पिता जी, आप कहते हैं न कि कर्मों का फल यहीं मिलता है? तो फिर हम क्यों भुगतें उन पापों को जो हमने किए ही नहीं? मैं पढूंगा, चाहे मुझे रात-रात भर जागना पड़े। मैं आपके और माँ के सारे सपने पूरे करूँगा।"
मुकुल की माँ, यशोदा, की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने अपने बेटे को गले से लगा लिया। "मेरा लाल! तू बस अपनी पढ़ाई कर। दुनिया क्या कहती है, उस पर ध्यान मत दे।"
दिन बीतते गए। मुकुल की दिनचर्या बेहद कठिन थी। सुबह उठकर पिता के साथ खेतों में जाना, मवेशियों को चारा डालना और फिर मीलों पैदल चलकर उस सरकारी स्कूल में जाना, जहाँ छत से बारिश का पानी टपकता था और टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती थी। इसके विपरीत, उसका मित्र रोहन (जिसके घर से मुकुल को भगा दिया गया था) गाँव के सबसे रसूखदार परिवार से था। रोहन के पास नई किताबें, अच्छे कपड़े और शहर से आने वाले ट्यूटर थे।
रोहन और मुकुल स्कूल में अच्छे दोस्त थे। बच्चों का मन साफ होता है, वे जाति और धर्म के चश्मे से दुनिया को नहीं देखते। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े हो रहे थे, समाज उन्हें उनकी 'जगह' याद दिलाने लगा था। गाँव के लोग अक्सर मुकुल को ताना मारते, "अरे रामलखन के लड़के, पढ़-लिख कर कौन सा कलेक्टर बन जाएगा? आखिर में तो खेत ही जोतना है।"
लेकिन मुकुल ने इन तानों को अपनी ढाल बना लिया। वह रोहन की पुरानी किताबें माँग कर पढ़ता। रात को जब गाँव में बिजली कट जाती, तो वह मिट्टी के तेल की ढिबरी (लैंप) की मद्धिम रोशनी में अपनी आँखें गड़ाए गणित के सवाल हल करता रहता।
### भाग 2: प्रतियोगिता और एक नई लड़ाई
समय ने करवट ली। दोनों अब शहर के एक बड़े कॉलेज में आ गए थे। यह वह दौर था जब करियर की चिंता युवाओं के मन पर हावी होने लगती है। दोनों ने सिविल सेवा (UPSC) की तैयारी करने का फैसला किया।
शहर आकर मुकुल की चुनौतियाँ और बढ़ गईं। उसके पास कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे। वह दिन में एक छोटे से ढाबे पर बर्तन धोने और हिसाब रखने का काम करता, और रात को अपनी किताबों में डूब जाता। रोहन के पिता ने उसे शहर के सबसे महंगे कोचिंग सेंटर में दाखिला दिला दिया था। रोहन के पास वातानुकूलित कमरा था, इंटरनेट था और हर वह सुविधा थी जो एक छात्र को चाहिए।
एक दिन रोहन मुकुल के छोटे से सीलन भरे कमरे में आया।
"यार मुकुल, तू इतनी मेहनत कैसे कर लेता है? मेरे पास तो सब कुछ है, फिर भी मुझे पढ़ने में आलस आता है," रोहन ने कहा।
मुकुल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "तुम्हारे लिए पढ़ाई एक विकल्प है रोहन, एक अच्छा करियर बनाने का रास्ता। मेरे लिए पढ़ाई अस्तित्व की लड़ाई है। अगर मैं नहीं पढ़ा, तो मैं वापस उसी दलदल में चला जाऊंगा जहाँ इंसान की कीमत उसकी जाति से तय होती है।"
परीक्षा का समय नजदीक आ गया। दोनों ने जी-तोड़ मेहनत की। प्रारंभिक परीक्षा (Prelims), मुख्य परीक्षा (Mains) और अंत में साक्षात्कार (Interview)। महीनों का तनाव और रातों की नींद हराम करने के बाद आख़िरकार परिणाम का दिन आ गया।
भाग 3: परिणाम की घोषणा और टूटते रिश्ते
परिणाम घोषित हुए। इंटरनेट कैफ़े में मुकुल और रोहन एक साथ बैठे थे।
रोहन के हाथ काँप रहे थे। उसने अपना रोल नंबर डाला। उसका नाम सूची में नहीं था। रोहन का कुल स्कोर कट-ऑफ से महज कुछ अंकों से पीछे रह गया था।
मुकुल ने धड़कते दिल से अपना रोल नंबर डाला। स्क्रीन पर उसका नाम चमक रहा था। उसने परीक्षा पास कर ली थी। उसे एक अच्छा रैंक मिला था, लेकिन जब रोहन ने मुकुल के अंक देखे, तो वह सन्न रह गया। मुकुल के अंक रोहन से थोड़े कम थे, लेकिन अनुसूचित जाति (SC) के कोटे (आरक्षण) के कारण मुकुल का चयन हो गया था, जबकि सामान्य वर्ग (General Category) में होने के कारण अधिक अंक लाकर भी रोहन का चयन नहीं हो सका।
उस पल, उस छोटे से कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। जो खुशी मुकुल के चेहरे पर आनी चाहिए थी, वह रोहन के उतरे हुए चेहरे को देखकर दब गई।
"बधाई हो मुकुल," रोहन ने भारी आवाज़ में कहा और बिना कुछ और बोले वहाँ से चला गया।
अगले कुछ दिन मुकुल के लिए बहुत कठिन रहे। एक तरफ गाँव में जश्न का माहौल था। रामलखन की छाती गर्व से चौड़ी हो गई थी। जिस यशोदा को कभी पंडित जी ने घर के अंदर नहीं घुसने दिया था, आज उसी गाँव के सरपंच उनके घर मिठाई लेकर आ रहे थे।
लेकिन मुकुल का मन अशांत था। उसने रोहन से मिलने की कोशिश की। रोहन के घर पहुँचने पर रोहन ने अपनी भड़ास निकाल दी।
"यही है तुम्हारा न्याय मुकुल? मैंने तुमसे ज्यादा मेहनत की, मेरे नंबर तुमसे ज्यादा थे, लेकिन मुझे क्या मिला? असफलता! और तुम्हें कम नंबर लाकर भी कुर्सी मिल गई। क्या यही समानता है? यह आरक्षण इस देश के टैलेंट को मार रहा है। यह एक अभिशाप है!" रोहन चीख रहा था।
मुकुल ने शांति से रोहन की आँखों में देखा और कहा, "रोहन, मुझे तुम्हारी पीड़ा का अहसास है। मैं मानता हूँ कि तुम्हें तुम्हारी मेहनत का फल नहीं मिला। लेकिन क्या तुम मेरी एक बात सुनोगे?"
रोहन ने मुँह फेर लिया, लेकिन मुकुल बोलता रहा।
"तुमने मेरी और अपनी तुलना अंकों के आधार पर की। लेकिन क्या हमारी शुरुआत एक जैसी थी? तुमने उन किताबों से पढ़ाई की जो नई और महंगी थीं, मैंने उन किताबों से पढ़ा जो तुमने रद्दी में बेच दी थीं। तुमने एसी कमरे में बैठकर मॉक टेस्ट दिए, मैंने ढाबे की भट्टी के सामने बैठकर नोट्स बनाए। तुम्हारे परिवार में पीढ़ियों से शिक्षा का माहौल है, मेरे पिता आज भी अपना नाम नहीं लिख सकते।"
मुकुल की आवाज़ भारी हो गई, "तुम कह रहे हो कि मैं आरक्षण के कारण जीता हूँ। नहीं रोहन! आरक्षण ने मुझे सिर्फ वह सीढ़ी दी है, जो तुम्हारे परिवार ने सदियों पहले खुद के लिए बना ली थी। जब बचपन में तुम्हारी माँ ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया था, क्योंकि मैं नीची जाति का था, तब मेरी 'मेरिट' कहाँ थी? जब मेरे पिता को कुएं से पानी नहीं लेने दिया जाता था, तब समानता कहाँ थी? आरक्षण गरीबी दूर करने का साधन नहीं है मेरे दोस्त, यह समाज में उस प्रतिनिधित्व (Representation) को लाने का जरिया है, जिससे सदियों से हमें वंचित रखा गया।"
रोहन निशब्द था, लेकिन उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। दोनों के रास्ते हमेशा के लिए अलग हो गए।
भाग 4: एक अधिकारी का सफर
मुकुल अब एक IAS अधिकारी बन चुका था। उसकी पहली पोस्टिंग एक पिछड़े जिले में हुई जहाँ जातिवाद अपनी जड़ों में गहराई तक समाया हुआ था। मुकुल ने कभी अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल नहीं किया। वह हर गरीब, हर बेबस इंसान की आवाज़ बन गया—चाहे वह सवर्ण हो या दलित।
उसे अक्सर अपने विभाग में भी दबी ज़बान में 'कोटा वाला अफसर' (Quota Officer) कहकर ताने मारे जाते। लोग उसकी काबलियत पर नहीं, बल्कि उसके सरनेम पर चर्चा करते। लेकिन मुकुल ने इन सब बातों का जवाब अपने काम से दिया। उसने जिले में शिक्षा व्यवस्था को सुधारा, किसानों के लिए सिंचाई की व्यवस्था की और भ्रष्टाचारियों की नींद हराम कर दी।
दूसरी तरफ, रोहन ने हार नहीं मानी। सरकारी नौकरी न मिलने पर उसने निजी क्षेत्र (Private Sector) में कदम रखा। उसकी मेहनत रंग लाई और उसने अपना एक बड़ा बिजनेस खड़ा कर लिया। वह एक सफल उद्यमी (Entrepreneur) बन गया। लेकिन उसके मन के किसी कोने में आरक्षण को लेकर कड़वाहट अब भी बाकी थी।
भाग 5: समय का चक्र और एक नई समझ
करीब पंद्रह साल बीत चुके थे। मुकुल अब उसी राज्य का एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (Senior Bureaucrat) था। एक दिन उसके कार्यालय में एक बड़ी कंपनी का प्रतिनिधिमंडल (Delegation) आया। यह कंपनी राज्य में एक बड़ा कारखाना लगाना चाहती थी, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिलने वाला था।
जब प्रतिनिधिमंडल अंदर आया, तो मुकुल अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। सामने रोहन खड़ा था। रोहन उस कंपनी का सीईओ था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इतने सालों की दूरियां, गिले-शिकवे सब उस एक नजर में तैर गए।
औपचारिक बैठक खत्म होने के बाद, मुकुल ने रोहन को रुकने के लिए कहा।
"कैसे हो रोहन?" मुकुल ने अपनी कुर्सी से उठकर उसे गले लगाते हुए पूछा।
रोहन मुस्कुराया, "बहुत अच्छा हूँ सर! और आपको इस कुर्सी पर देखकर सच में बहुत गर्व हो रहा है।"
शाम को दोनों मुकुल के घर पर बैठे चाय पी रहे थे। बातों का सिलसिला फिर उसी मोड़ पर आ गया, जहाँ सालों पहले टूट गया था।
"मुकुल, मैं आज तुमसे एक बात कबूल करना चाहता हूँ," रोहन ने चाय का कप रखते हुए कहा। "उन दिनों मैं अपने गुस्से में अंधा हो गया था। मुझे लगता था कि तुमने मेरा हक छीना है। लेकिन जब मैं बिजनेस में आया और मैंने देश के असली हालात देखे, तब मुझे तुम्हारी उस दिन की बात समझ आई।"
मुकुल ध्यान से सुन रहा था।
रोहन ने आगे कहा, "मैंने देखा कि कैसे आज भी कॉर्पोरेट बोर्डरूम में बैठे ९०% लोग एक खास वर्ग के हैं। मैंने देखा कि कैसे गाँवों में आज भी दलितों को घोड़ी चढ़ने पर पीटा जाता है। मुझे समझ आ गया कि योग्यता (Merit) सिर्फ परीक्षा के अंकों से नहीं आती, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों से भी आती है जिनमें एक व्यक्ति पलता-बढ़ता है। अगर तुम्हारी जगह किसी और को यह मौका न मिला होता, तो शायद आज तुम यहाँ बैठकर नीतियां नहीं बना रहे होते।"
मुकुल ने गहरी साँस ली और बोला, "लेकिन रोहन, तुम्हारी बात भी अपनी जगह गलत नहीं थी। आरक्षण एक वरदान बनकर आया था उन शोषितों के लिए, जिन्हें समाज ने कुचल दिया था। लेकिन आज, मैं यह भी देखता हूँ कि इसका फायदा कई बार उन लोगों को मिल रहा है, जो पहले से सशक्त हो चुके हैं—जिन्हें हम 'क्रीमी लेयर' कहते हैं। एक दलित आईएएस अधिकारी का बेटा, जो कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ता है, उसे शायद आरक्षण की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी गाँव के उस गरीब सवर्ण बच्चे को है, जिसके पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं हैं।"
रोहन ने हामी भरी। "तो फिर इसका समाधान क्या है मुकुल? क्या यह कभी खत्म होगा?"
"समाधान सिर्फ सरकारी नीतियों में नहीं है, रोहन," मुकुल ने गंभीरता से कहा। "जिस दिन यह समाज जाति पूछना बंद कर देगा, जिस दिन किसी भी रामलखन को इसलिए अपमानित नहीं होना पड़ेगा क्योंकि वह छोटी जाति का है, जिस दिन अंतरजातीय विवाह (Inter-caste marriages) समाज में सामान्य बात हो जाएंगे, उस दिन आरक्षण की कोई जरूरत नहीं रहेगी। जब तक समाज में मानसिक तौर पर छुआछूत और भेदभाव का कैंसर मौजूद है, तब तक आरक्षण रूपी कीमोथेरेपी (Chemotherapy) देनी ही पड़ेगी। लेकिन हाँ, इसके स्वरूप में समय के साथ बदलाव जरूर होना चाहिए, ताकि कोई भी गरीब—चाहे वह किसी भी जाति का हो—पीछे न छूट जाए।"
### भाग 6: निष्कर्ष
रात काफी हो चुकी थी। रोहन अपने घर के लिए निकल चुका था। मुकुल अपनी बालकनी में खड़ा शहर की जगमगाती रोशनी को देख रहा था।
वह सोच रहा था कि आरक्षण कोई सीधा गणित नहीं है कि उसे 'सही' या 'गलत' के पलड़े में तौल दिया जाए। यह भारत के ऐतिहासिक घावों पर लगाया गया एक मरहम है।
जब तक समाज में वह वर्ग है, जो आरक्षण की वजह से अपनी पहली पीढ़ी को स्कूल भेज पा रहा है, तब तक यह **'वरदान'** है।
लेकिन जब कोई मेधावी छात्र सिस्टम की खामियों के कारण अवसर से वंचित रह जाता है, और जब राजनेता इसका इस्तेमाल सिर्फ वोट बैंक के लिए करने लगते हैं, तब यह एक **'अभिशाप'** जैसा लगने लगता है।
कहानी यहाँ खत्म नहीं होती, बल्कि यह एक शुरुआत है उस सोच की, जहाँ हम सिर्फ अपना नहीं, बल्कि सामने वाले के नजरिए से भी दुनिया को देखना शुरू करें।
समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम दर्द को बाँटते नहीं, उसकी तुलना करते हैं। आरक्षण सही है या गलत, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरफ खड़े हैं। लेकिन क्या हम एक ऐसा समाज नहीं बना सकते जहाँ किसी को न तो अपने हक़ के लिए लड़ना पड़े, और न ही किसी को अपना हक़ छिनने का डर हो? यही इस कहानी का असली संदेश है।
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